......प्रत्येक मनुष्य को पुस्तकें पढने की आदत डालनी चाहिए , अगर आप अपनी पुस्तकें पढ़ नहीं सकते तो कम से कम रोज उनकी निगाह्बीनी करिए , उन्हें छुइए , टटोलिये , उनके साथ प्रेम करिए , उन्हें निहारिये , उनका सामीप्य महसूस करिए , रख दीजिये , फिर उठाइए , कहीं से भी खोलिए और जहां निगाह अटके वहाँ से कोई चैप्टर पढ़िए , उन्हें झाड़ पोंछ कर , शेल्फ पर खुद रखिये , अपने संकलन को अपने हाथ क्रम से लगाइए , ताकि अगर आपको यह भी नहीं पता कि उनमें क्या लिखा है , फिर भी कम से कम यह इल्हाम तो रहेगा ही कि कौन सी पुस्तक कहाँ उपलब्ध है ......पुस्तक के साथ बिताया हर लम्हा आपको कुछ न कुछ देकर जाएगा ...
.....मैंने खुद इतनी उम्र में शायद ही कोई दिन ऐसा गया होगा जब किसी पुस्तक के साथ कुछ समय न बिताया हो....
......यूँ मानिए कि तीन कमरों में सिर्फ मेरी लायब्रेरी है ....मैंने एक एक किताब को कई कई बार पढ़ा है , और वह सिलसिला आज तक बदस्तूर जारी है .
......ध्यान रखिये ! पुस्तकें आपकी सबसे बड़ी मित्र हैं तनहा होने पर भी वह आपकी मित्र होती है ....सब आपका साथ छोड़ सकते हैं लेकिन पुस्तके आपको कभी नहीं छोड़ेंगी .....इसलिए पुस्तकों
को अपना सच्चा हमदर्द मानिए , और उन्हें अपनाइए..........http://vijayrajrajeshwar.jagranjunction.com/2014/06/26/%E0%A4%B8%E0%A4%A8%E0%A4%BE%E0%A4%A4%E0%A4%A8-%E0%A4%A7%E0%A4%B0%E0%A5%8D%E0%A4%AE-%E0%A4%95%E0%A4%BE-%E0%A4%AE%E0%A4%B0%E0%A5%8D%E0%A4%AE/
.....मैंने खुद इतनी उम्र में शायद ही कोई दिन ऐसा गया होगा जब किसी पुस्तक के साथ कुछ समय न बिताया हो....
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......ध्यान रखिये ! पुस्तकें आपकी सबसे बड़ी मित्र हैं तनहा होने पर भी वह आपकी मित्र होती है ....सब आपका साथ छोड़ सकते हैं लेकिन पुस्तके आपको कभी नहीं छोड़ेंगी .....इसलिए पुस्तकों
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